"क्या मगरमच्छ रोते है" यह सवाल ज़्यादातर भारत मे सुनने को मिलता है क्योंकि यहां एक कहाबत प्रचलित है कि मगरमच्छ के आंसू मत रो। यह कहाबत अक्सर उन लोगो को कहां जाता है जो लोग झुटे यानी नकली आंसू रोते है।
Research क्या कहती है
मगरमच्छ सच में रोते है या फिर नही इसे लेकर साल 2006 में सात मगरमच्छ के ऊपर एक शोध किया गया जिसमें पता चला मगरमच्छ वास्तव में रोते हैं जब वो खाना खाते हैं, क्योंकि उनके जबड़े में बोहोत ताक़त होता है और जब वो इसी ताक़त के साथ अपना भोजन चबाते हैं तब उनकी आंसू ग्रंथि उत्तेजित हो जाता है जिस वजह से उनके आंखों में नमी और बुलबुले विकसित होता है।
क्या मगरमच्छ वास्तव में रोते हैं?
वैज्ञानिक सोच वाले चिकित्सकों और विद्वानों ने लंबे समय से इस बात को समझने की कोशिश की है कि क्या मगरमच्छ सच में रोते है।
इसे लेकर सबसे पहले 18वीं शताब्दी में Swiss चिकित्सक और प्रकृतिवादी Johann Jakob Scheuchzer ने कहा था कि इस कहाबत का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। लेकिन 20वीं शताब्दी में एक अन्य वैज्ञानिक George Johnson ने एक प्रयोग किया, जिसके दौरान उन्होंने मगरमच्छ की आंखों पर प्याज और नमक को रगड़ कर यह जांचा कि वह रोते है या फिर नही, पर जब मगरमच्छ नहीं रोया, तो जॉनसन ने कहा कि मगरमच्छ के आंसू यह कहाबत एक मिथक है।
इसके बाद साल 2006 में न्यूरोलॉजिस्ट D Malcolm Shaner और Zoologist Kent A Vliet ने कई मगरमच्छों को फिल्माया ताकि इस बात का सही से पता चले कि क्या मगरमच्छ रोते है या फिर नही।
इस बार प्रयोग के दौरान सात मगरमच्छों को सूखी भूमि पर रख कर खिलाया जाए ताकि झील के पानी को आंसू ना समझा जाये। सात मगरमच्छों में से, यह पाया गया कि उनमें से पांच मगरमच्छों ने भोजन करते समय अपनी आंखों में नमी और बुलबुले विकसित किए जबकि दो अन्य मगरमच्छों की आंखों में कोई नमी विकसित नहीं हुई।
इस प्रयोग से यह साबित हो गया है कि मगरमच्छ वास्तव में रोते हैं जब वह खाते हैं क्योंकि उनके जबड़े में एक आक्रामक आंदोलन होता है जब वह अपना भोजन चबाते हैं जिस वजह से उनकी आंसू ग्रंथि उत्तेजित हो जाता है और पानी निकल ता है।

