कोणार्क सूर्य मंदिर को 13 बीं शताब्दी में बनाया गया था जो भारत के ओडिशा राज्य में करीब 26 एकर में फैला हुआ है। लेकिन कुछ विशेषज्ञों मानते हैं यह मंदिर 9 वीं या फिर 7 वीं शताब्दी में बनाया गया था, जिसे पूर्वी गंगा राजबंश के राजा नरसिंहदेव प्रथम के शासनकाल में बनाया गया था। यह एक हिंदू मंदिर है जो पूरी तरह से सूर्य देवता के ऊपर समर्पित है।
कोणार्क सूर्य मंदिर
कोणार्क सूर्य मंदिर प्राचीनतम होने के साथ साथ कलाकृति और वास्तुकला लिए भी मशहूर है। मंदिर में रथ में सवार सूर्य देव को पूर्व में उठते हुए दिखाया गया है जिसे सात घोड़े खिंच रहे है। यहां सात घोड़े सप्ताह के सात दिनों को दर्शाता है, और रथ पर लगे 12 पहिये साल के 12 महीने को दर्शाता है।
इसके अलावा यह मंदिर कलाकृति के लिए भी जाना जाता है। इस मंदिर में हिन्दू देवी देवताओं समेत मानवजीवन से जुड़ी हर बात को कलाकृति की आकार में दिखाया गया है।
लेकिन इस मंदिर में मौजूद कामुक मूर्तियों की वजह से बोहोत से लेखकों ने इसका आलोचना किया है पर नावेल विजेता Rabindranath Thakur ने इसे लेकर बताया है कि यहां पत्थर की भाषा मानव की भाषा को पार करती है।
कोणार्क सूर्य मंदिर का इतिहास
कोणार्क सूर्य मंदिर का इतिहास बोहोत ज्यादा अशांत रहा है। इस मंदिर को साल 1676 की शुरुआत में यूरोपीय नाविक "Black Pagoda" के नाम से बुलाते थे क्योंकि समुंदर के रास्ते से गुजरते समय सूर्य मंदिर की शिखर काले रंग जैसा दिखता था।
लेकिन 17 शताब्दी आते आते यह मंदिर एक खंडहर में तब्दील हो गया क्योंकि इस बीच मुस्लिम आक्रमणकारियों ने कोणार्क सूर्य मंदिर के ऊपर लगातार आक्रमण किया जिसके बाद इसे कभी दोबारा बनाया नहीं गया, और अब यह मंदिर एक खंडहर में तब्दील हो चुका है।
साल 1984 में UNESCO द्वारा इस मंदिर को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया, और भारत सरकार इस मंदिर की अहमियत दिखाने के लिए वर्तमान समय में जारी ₹10 के नोट में कोणार्क मंदिर को दर्शाया है।
कोणार्क नाम का रहस्य
कोणार्क सूर्य मंदिर, पुरी जगन्नाथ मंदिर और भुवनेश्वर का लिंगराज मंदिर एक द्विपक्षीय त्रिकोण बनाता है और कोणार्क मंदिर इस त्रिकोण का कोणीय बिंदु है, जिस वजह से मंदिर का नाम कोणार्क रखा गया। संस्कृत शब्द 'कोणा' यानी कोण को दर्शाता है और 'अर्का' का अर्थ हिंदू भगवान सूर्य से है।
कोणार्क सूर्य मंदिर का रहस्य
लोगो के मुताबित कोणार्क सूर्य मंदिर के ऊपर एक 52 टन का चुम्बक हुआ करता था जिस वजह से सूर्य मन्दिर समुंदर के पास होते हुए भी समुंदर के प्रतिकूलता को झेल पाता था, इसके अलावा मुख्य चुम्बक के साथ कुछ और सहायक चुम्बक भी मंदिर में लगाया गया था जिस कारण मंदिर में सूर्य देव की प्रतिमा हवा में रहती थी।
लेकिन इस चुम्बक की वजह से कोणार्क के पास से जहाज़ों को आने जाने में दिक्कत होती थी। इसी वजह से बाद में इस चुम्बक को निकाल लिया गया जिस कारण मंदिर को क्षति पौंछि थी।

